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Tarkeshwar Sharma "Radhey"

Tarkeshwar Nath Sharma
 (Tarkeshwar "Radhey")


● Date of Birth
    05 Feb.

●Education
  Graduation in JPU, Chchapra (Bihar)
  BE(Mechanical) New Delhi

●Occupation
   Singer, Actor & Engineer

●Live
   New Delhi


















●Social Media
   






●Refrence
  1.  http://punsong.com/videos/today/hlNFOw3dBAs/maiya-rani-singer-by-tarkeshwar-radhey.html
  2. http://bubblepot.co/tarkeshwar-radhe-at111999552
  3. http://sanimahall.com/videos/4450/flying-kiss-bhauji-na-kahi-tarkeshwar-radhey-bhojpuri
  4. http://www.raaga.com/bhojpuri/singer/Tarkeshwar-Radhey
  5. https://www.bollywoodmantra.com/video/flying-kiss-baat-hamaro-mani-tarkeshwar-radhey-bhojpuri/
  6. http://mio.to/artist/Tarkeshwar+Radhe
  7. http://bhojpurisaavn.com/radha-rani-karo-hum-pe-raham.html


Please Note:- आपके पास About Actor Tarkeshwar Radhey In Hindi मैं और Information हैं, या दी गयी जानकारी मैं कुछ गलत लगे तो तुरंत हमें कमेंट या ईमेल मैं लिखे हम इस अपडेट करते रहेंगे।


Narendra Modi

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नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2014 को भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और वे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म आजादी के बाद हुआ है। ऊर्जावान, समर्पित एवं दृढ़ निश्चय वाले नरेन्द्र मोदी एक अरब से अधिक भारतीयों की आकांक्षाओं और आशाओं के द्योतक हैं।

मई 2014 में अपना पद संभालने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी चहुंमुखी और समावेशी विकास की यात्रा पर निकल पड़े हैं जहां हर भारतीय अपनी आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सके। वे 'अंत्योदय', अर्थात, अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाने के सिद्धांत से अत्यधिक प्रेरित हैं।

नवीन विचारों और पहल के माध्यम से सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रगति की रफ्तार तेज हो और हर नागरिक को विकास का लाभ मिले। अब शासन मुक्त है, इसकी प्रक्रिया आसान हुई है एवं इसमें पारदर्शिता आई है।

पहली बार प्रधानमंत्री जन-धन योजना के माध्यम से अभूतपूर्व बदलाव आया है जिसके अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया है कि देश के सभी नागरिक वित्तीय तंत्र में शामिल हों। कारोबार को आसान बनाने के अपने लक्ष्य को केंद्र में रखकर 'मेक इन इंडिया' के उनके आह्वान से निवेशकों और उद्यमियों में अभूतपूर्व उत्साह और उद्यमिता के भाव का संचार हुआ है। 'श्रमेव जयते' पहल के अंतर्गत श्रम सुधारों और श्रम की गरिमा से लघु और मध्यम उद्योगों में लगे अनेक श्रमिकों का सशक्तिकरण हुआ है और देश के कुशल युवाओं को भी प्रेरणा मिली है।

पहली बार भारत सरकार ने भारत के लोगों के लिए तीन सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की शुरुआत की और साथ-ही-साथ बुजुर्गों को पेंशन एवं गरीबों को बीमा सुरक्षा देने पर भी ध्यान केंद्रित किया है। जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री ने डिजिटल इंडिया बनाने के उद्देश्य से डिजिटल इंडिया मिशन की शुरुआत की ताकि प्रौद्योगिकी की मदद से लोगों के जीवन में बेहतर बदलाव लाए जा सकें।

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2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी की जयंती पर प्रधानमंत्री ने 'स्वच्छ भारत मिशन – देशभर में स्वच्छता के लिए एक जन-आंदोलन' की शुरुआत की। इस अभियान की व्यापकता एवं इसका प्रभाव ऐतिहासिक है।

नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति से संबंधित विभिन्न पहल में विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की वैश्विक मंच पर वास्तविक क्षमता एवं भूमिका की छाप दिखती है। उन्होंने सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति में अपने कार्यकाल की शुरुआत की। संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए उनके भाषण की दुनिया भर में प्रशंसा हुई। नरेन्द्र मोदी भारत के ऐसे प्रथम प्रधानमंत्री बने जिन्होंने 17 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद नेपाल, 28 वर्ष बाद ऑस्ट्रेलिया, 31 वर्ष बाद फिजी और 34 वर्ष बाद सेशेल्स की द्विपक्षीय यात्रा की। पदभार ग्रहण करने के बाद से नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र, ब्रिक्स, सार्क और जी-20 शिखर सम्मेलनों में भाग लिया, जहां अनेक प्रकार के वैश्विक, आर्थिक और राजनैतिक मुद्दों पर भारत के कार्यक्रमों एवं विचारों की जबर्दस्त सराहना की गई। जापान की उनकी यात्रा से भारत-जापान संबंधों में एक नए युग की शुरुआत हुई। वे मंगोलिया की यात्रा करने वाले प्रथम भारतीय प्रधानमंत्री हैं और चीन व दक्षिण कोरिया की उनकी यात्राएं भारत में निवेश लाने की दृष्टि से कामयाब रही हैं। फ्रांस और जर्मनी की अपनी यात्रा के दौरान वे यूरोप के साथ निरंतर जुड़े रहे।

श्री नरेन्द्र मोदी ने अरब देशों के साथ मजबूत संबंधों को काफी महत्व दिया है। अगस्त 2015 में संयुक्त अरब अमीरात की उनकी यात्रा 34 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी जिसके दौरान उन्होंने खाड़ी देशों के साथ भारत की आर्थिक भागीदारी को बढ़ाने के लिए व्यापक स्तर पर पहल की। जुलाई 2015 में श्री मोदी ने पांच मध्य एशियाई देशों का दौरा किया। यह यात्रा अपने-आप में खास एवं विशेष रही। भारत और इन देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, संस्कृति और अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण समझौते हुए। अक्टूबर 2015 में नई दिल्ली में ऐतिहासिक भारत-अफ्रीका फोरम सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें 54 अफ्रीकी देशों ने भाग लिया। 41 अफ्रीकी देशों के नेताओं ने इस सम्मेलन में भाग लिया जिसमें भारत-अफ्रीका संबंधों को मजबूत बनाने पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। स्वयं प्रधानमंत्री ने सम्मेलन में भाग लेने आये अफ्रीकी नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठक की।

नवंबर 2015 में प्रधानमंत्री ने सीओपी-21 शिखर सम्मेलन में भाग लिया जहाँ उन्होंने विश्व के अन्य नेताओं के साथ जलवायु परिवर्तन पर विचार-विमर्श किया। श्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने उर्जा संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सौर ऊर्जा का समुचित उपयोग करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सौर एलायंस का उद्घाटन किया।

अप्रैल 2016 में प्रधानमंत्री ने परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन में भाग लिया जिसमें उन्होंने विश्व मंच पर परमाणु सुरक्षा के महत्व के बारे में एक मजबूत संदेश दिया। उन्होंने सऊदी अरब का दौरा किया जहां उन्हें सऊदी अरब के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, किंग अब्दुलअजीज सैश से सम्मानित किया गया।

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी अबॉट, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एवं जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल सहित विश्व के कई अन्य नेताओं ने भारत का दौरा किया है एवं इन दौरों से भारत व इन देशों के बीच सहयोग सुधारने में सफलता मिली है। वर्ष 2015 के गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति बराक ओबामा प्रमुख अतिथि के रूप में भारत दौरे पर आए जो भारत-अमेरिका संबंधों के इतिहास में पहली बार हुआ है। अगस्त 2015 में भारत ने एफआईपीआईसी शिखर सम्मेलन की मेजबानी की जिसमें प्रशांत द्वीप समूह के शीर्ष नेताओं ने भाग लिया। इस दौरान प्रशांत द्वीप समूह के साथ भारत के संबंधों से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की गई।

किसी भी एक दिन को "अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" के रूप में मनाए जाने के नरेन्द्र मोदी के आह्वान को संयुक्त राष्ट्र में जबर्दस्त समर्थन प्राप्त हुआ। पहली बार विश्व भर के 177 देशों ने एकजुट होकर 21 जून को "अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" के रूप में मनाए जाने का संकल्प संयुक्त राष्ट्र में पारित किया।

उनका जन्म 17 सितम्बर 1950 को गुजरात के छोटे से शहर में हुआ जहां वे गरीब किन्तु स्नेहपूर्ण परिवार में बड़े हुए। जीवन की आरंभिक कठिनाइयों ने न केवल उन्हें कठिन परिश्रम का मूल्य सिखाया बल्कि उन अपरिहार्य दुखों से भी परिचित कराया जिससे आम जनों को अपने दैनिक जीवन में गुजरना पड़ता है। इससे उन्हें अल्पायु में ही स्वयं को आमजन एवं राष्ट्र की सेवा में समर्पित करने की प्रेरणा मिली। प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित राष्ट्रवादी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ कार्य किया एवं इसके उपरांत वे राज्य स्तर व राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी संगठन के साथ कार्य करते हुए राजनीति से जुड़ गए।

वर्ष 2001 में वे अपने गृह राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में चार गौरवपूर्ण कार्यकाल पूरे किए। उन्होंने विनाशकारी भूकंप के दुष्प्रभावों से जूझ रहे गुजरात को विकास रुपी इंजन के रूप में परिवर्तित कर दिया जो आज भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

नरेन्द्र मोदी एक जन-नेता हैं जो लोगों की समस्याओं को दूर करने तथा उनके जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्हें लोगों के बीच जाना, उनकी खुशियों में शामिल होना तथा उनके दुखों को दूर करना बहुत अच्छा लगता है। जमीनी स्तर पर लोगों के साथ गहरा निजी संपर्क होने के साथ-साथ वे ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं। तकनीक के प्रति प्रेम एवं उसमें समझ रखने वालों नेताओं में वे भारत के सबसे बड़े राजनेता हैं। वेबसाइट के माध्यम से लोगों तक पहुंचने और उनके जीवन में बदलाव लाने के लिए वे हमेशा कार्यरत हैं। वे सोशल मीडिया, जैसे – फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस, इन्स्टाग्राम, साउंड क्लाउड, लिंक्डइन, वीबो तथा अन्य प्लेटफार्म पर भी काफी सक्रिय हैं।

राजनीति के अलावा नरेन्द्र मोदी को लेखन का भी शौक है। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें कविताएं भी शामिल हैं। वे अपने दिन की शुरुआत योग से करते हैं। योग उनके शरीर और मन के बीच सामंजस्य स्थापित करता है एवं बेहद भागदौड़ की दिनचर्या में उनमें शांति का संचार करता है।

वे साहस, करुणा और विश्वास से पूर्ण एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसे देश ने इस विश्वास के साथ अपना जनादेश दिया है कि वे भारत का पुनरुत्थान करेंगे और उसे दुनिया का पथ–प्रदर्शक बनाएंगे।

बराक ओबामा - चुटकीले

बड़ा आदमी एक बार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपनी कार खुद ही चला रहे थे

 और ड्राइवर पीछे बैठा था। उनसे गलती से रेड लाइट पार हो गई।
 
ट्रैफिक पुलिस हवलदार ने कार रोक ली और पास आकर गाड़ी में झांकने के बाद अपने अधिकारी को फोन किया,

 'हैलो सर लाइट जंप केस है पर बहुत बड़ा आदमी है। चालान नहीं काट पा रहा हूं।
 
 अधिकारी : पता करो कौन है? हवलदार : यह तो नहीं पता पर उसने बराक ओबामा जी को ड्राइवर रखा हुआ है! 

Dr Rajendra Prasad

राष्ट्रपति के सूचि में पहला नाम डॉ राजेन्द्र प्रसाद का आता है। जो भारतीय संविधान के आर्किटेक्ट और आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपति भी थे। उनका जन्म 1884 में हुआ था और डॉ प्रसाद, महात्मा गांधी के काफी करीबी सहयोगी भी थे। इसी वजह से वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में भी शामिल हो गए थे और बाद में बिहार क्षेत्र के प्रसिद्ध नेता बने। नमक सत्याग्रह के वे सक्रीय नेता थे और भारत छोडो आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया था और ब्रिटिश अधिकारियो को घुटने टेकने पर मजबूर किया था।
Dr. Rajendra Prasad
पूरा नाम    – राजेंद्र प्रसाद महादेव सहाय
जन्म        – 3 दिसंबर 1884
जन्मस्थान – जिरादेई (जि. सारन, बिहार)
पिता        – महादेव
माता        – कमलेश्वरी देवी
शिक्षा      – *1907  में कोलकता विश्वविद्यालय से M.A., 1910 में बॅचलर ऑफ लॉ उत्तीर्ण, 1915 में मास्टर ऑफ लॉ उत्तीर्ण।
विवाह      – राजबंस देवी के साथ
डॉ. राजेंद्र प्रसाद – Dr Rajendra Prasad in Hindi
Dr Rajendra Prasad भारतीय लोकतंत्र के पहले राष्ट्रपति थे। साथ ही एक भारतीय राजनीती के सफल नेता, और प्रशिक्षक वकील थे। भारतीय स्वतंत्रता अभियान के दौरान ही वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में शामिल हुए और बिहार क्षेत्र से वे एक बड़े नेता साबित हुए। महात्मा गांधी के सहायक होने की वजह से, प्रसाद को ब्रिटिश अथॉरिटी ने 1931 के नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोडो आन्दोलन में जेल में डाला। राजेन्द्र प्रसाद ने 1934 से 1935 तक राष्ट्रपति के रूप में भारत की सेवा की। और 1946 के चुनाव में सेंट्रल गवर्नमेंट की फ़ूड एंड एग्रीकल्चर मंत्री के रूप में सेवा की। 1947 में आज़ादी के बाद, प्रसाद को संघटक सभा में राष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किया गया।
और 1950 में भारत जब स्वतंत्र गणतंत्र बना, तब अधिकारिक रूप से संघटक सभा द्वारा भारत का पहला राष्ट्रपति चुना गया। इसी तरह 1951 के चुनावो में, चुनाव निर्वाचन समिति द्वारा उन्हें वहा का अध्यक्ष चुना गया। राष्ट्रपति बनते ही प्रसाद ने कई सामाजिक भलाई के काम किये, कई सरकारी दफ्तरों की स्थापना की और उसी समय उन्होंने कांग्रेस पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया। और राज्य सरकार के मुख्य होने के कारण उन्होंने कई राज्यों में पढाई का विकास किया कई पढाई करने की संस्थाओ का निर्माण किया और शिक्षण क्षेत्र के विकास पर ज्यादा ध्यान देने लगे। उनके इसी तरह के विकास भरे काम को देखकर 1957 के चुनावो में चुनाव समिति द्वारा उन्हें फिर से राष्ट्रपति घोषित किया गया और वे अकेले ऐसे व्यक्ति बने जिन्हें लगातार दो बार भारत का राष्ट्रपति चुना गया।
एक नजर में  डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जानकारी – About Dr Rajendra Prasad In Hindi
  • 1906 में राजेंद्र बाबु के पहल से 'बिहारी क्लब' स्थापन हुवा था। उसके सचिव बने।
  • 1908 में राजेंद्र बाबु ने मुझफ्फरपुर के ब्राम्हण कॉलेज में अंग्रेजी विषय के अध्यापक की नौकरी मिलायी और कुछ समय वो उस कॉलेज के अध्यापक के पद पर रहे।
  • 1909 में कोलकत्ता सिटी कॉलेज में अर्थशास्त्र इस विषय का उन्होंने अध्यापन किया।
  • 1911 में राजेंद्र बाबु ने कोलकता उच्च न्यायालय में वकीली का व्यवसाय शुरु किया।
  • 1914 में बिहार और बंगाल इन दो राज्ये में बाढ़ के वजह से हजारो लोगोंको बेघर होने की नौबत आयी। राजेंद्र बाबु ने दिन-रात एक करके बाढ़ पीड़ितों की मदत की।
  • 1916 में उन्होंने पाटना उच्च न्यायालय में वकील का व्यवसाय शुरु किया।
  • 1917 में महात्मा गांधी चंपारन्य में सत्याग्रह गये ऐसा समझते ही राजेंद्र बाबु भी वहा गये और उस सत्याग्रह में शामिल हुये।
  • 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में वो शामील हुये। इसी साल में उन्होंने 'देश' नाम का हिंदी भाषा में साप्ताहिक निकाला।
  • 1921 में राजेंद्र बाबुने बिहार विश्वविद्यालय की स्थापना की।
  • 1924 में पाटना महापालिका के अध्यक्ष के रूप में उन्हें चुना गया।
  • 1928 में हॉलंड में 'विश्व युवा शांति परिषद' हुयी उसमे राजेंद्र बाबुने भारत की ओर से हिस्सा लिया और भाषण भी दिया।
  • 1930 में अवज्ञा आंदोलन में ही उन्होंने हिस्सा लिया। उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेजा गया। जेल में बुरा भोजन खाने से उन्हें दमे का विकार हुवा। उसी समय बिहार में बड़ा भूकंप हुवा। खराब तबियत की वजह से उन्हें जेल से छोड़ा गया। भूकंप पीड़ितों को मदत के लिये उन्होंने 'बिहार सेंट्रल टिलिफ'की कमेटी स्थापना की। उन्होंने उस समय २८ लाख रूपयोकी मदत इकठ्ठा करके भूकंप पीड़ितों में बाट दी।
  • 1934 में मुबंई यहा के कॉग्रेस के अधिवेशन ने अध्यपद कार्य किया।
  • 1936 में नागपूर यहा हुये अखिल भारतीय हिंदी साहित्य संमेलन के अध्यक्षपद पर भी कार्य किया।
  • 1942 में 'छोडो भारत' आंदोलन में भी उन्हें जेल जाना पड़ा।
  • 1946 में पंडित नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार स्थापन हुवा। गांधीजी के आग्रह के कारन उन्होंने भोजन और कृषि विभाग का मंत्रीपद स्वीकार किया।
  • 1947 में राष्ट्रिय कॉग्रेस के अध्यक्ष पद पर चुना गया। उसके पहले वो घटना समिती के अध्यक्ष बने। घटना समीति को कार्यवाही दो साल, ग्यारह महीने और अठरा दिन चलेगी। घटने का मसौदा बनाया। 26 नव्हंबर, 1949 को वो मंजूर हुवा और 26 जनवरी, 1950 को उसपर अमल किया गया। भारत प्रजासत्ताक राज्य बना। स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति होने का सम्मान राजेन्द्रबाबू को मिला।
  • 1950 से 1962 ऐसे बारा साल तक उनके पास राष्ट्रपती पद रहा। बाद में बाकि का जीवन उन्होंने स्थापना किये हुये पाटना के सदाकत आश्रम में गुजारा।
हम डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में याद करते है लेकिन इसके साथ ही उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता अभियान में भी मुख्य भूमिका निभाई थी और संघर्ष करते हुए देश को आज़ादी दिलवायी थी।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद में भारत का विकास करने की चाह थी। वे लगातार भारतीय कानून व्यवस्था को बदलते रहे और उपने सहकर्मियों के साथ मिलकर उसे और अधिक मजबूत बनाने का प्रयास करने लगे। हम भी भारत के ही रहवासी है हमारी भी यह जिम्मेदारी बनती है की हम भी हमारे देश के विकास में सरकार की मदद करे।ताकि दुनिया की नजरो में हम भारत का दर्जा बढ़ा सके।
Dr Rajendra Prasad Books / ग्रंथसंपदा  :-
  • डीव्हायडेड इंडिया
  • आत्मकथा
  • चंपारन्य सत्याग्रह का इतिहास आदी
Dr Rajendra Prasad Awards – पुरस्कार  :  1962 में 'भारतरत्न' ये सर्वोच्च भारतीय सम्मान उनको प्रदान किया गया।
Dr Rajendra Prasad Death – मृत्यू  :  28 फरवरी 1963 को उनकी मौत हुयी।
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सुविचार

*प्रकृति (Nature) के नियम --*

          *👉पहला नियम है कि यदि खेत में "बीज" न डाले जाएँ तो कुदरत (Nature) उसे "घास-फूस" से भर देती है ॥*
           *उसी तरह से यदि दिमाग में "सकारात्मक-विचार" न भरें जाएँ तो "नकारात्मक-विचार" अपनी जगह बना ही लेते हैं ॥*

          *👉दूसरा नियम है कि जिसके पास जो होता है वह वही बाँटता है --*
*"सुखी" - "सुख" बाँटता है ॥*
*"दु:खी" - "दुःख" बाँटता है ॥*
*"ज्ञानी" - "ज्ञान" बाँटता है ॥*
*"भ्रमित" - "भ्रम" बाँटता है और*
*"भयभीत" - "भय" बाँटता है ॥*

          *जो खुद डरा हुआ हो-वही औरों को डराता है ॥*
          *जो खुद दबा हुआ हो-वही औरों को दबाता है ॥*
          *जो खुद चमका हुआ हो-वही औरों को भी चमका सकता है ॥*
           *बस ठीक उसी तरह जो इंसान खुद सफल (Successful) हो-वही औरों को भी सफलता (Success) दिला सकता है ॥*
       

सुविचार

गीता  मे साफ़ शब्दो मे लिखा है ,निराश मत होना ,कमजोर तेरा वक्त है ," तु " नही ....................*
*ये संसार "जरूरत" के नियम पर चलता है....*
*सर्दियो में जिस "सूरज" का इंतजार होता है, उसी "सूरज" का गर्मियों में तिरस्कार भी होता है.....*
*आप की कीमत तब तक होगी जब तक आपकी जरुरत है...!*
जीवन मे दो तरह के दोस्त ज़रूर बनाएं ..
*☝🏽एक ' कृष्ण ' के जैसे, जो आपके लिए लड़ेंगे नहीं, पर ये  'सुनिश्चित ' करेंगे की जीत आप की ही हो ।*
*और ..*
*✌🏼दुसरा ' कर्ण ' की तरह जो आप के लिए तब भी लड़े..जब आपकी हार सामने दिख रही हो।*

महर्षि वाल्मीकि

एक बार की बात है, दिन छिप चुका था और थोड़ा अँधेरा हो रहा था, उस समय नारद मुनि उस जंगल में विचरण कर रहे थे कि तभी डाकू रत्नाकर ने अपने साथियों के साथ नारद जी को घेर लिया। नारद मुनि अपने आप में मग्न थे उनके मन में किसी प्रकार का कोई डर नहीं था।
रत्नाकर ने नारद जी से पूछा – सुनो ब्राह्मण, मैं रत्नाकर डाकू हूँ। क्या तुमको मुझसे भय नहीं लग रहा ?
नारद मुनि ने कहा – रत्नाकर मुझे किसी भी बात का भय नहीं है। मैं ना तो किसी असफलता से डरता हूँ और नाही मुझे अपने प्राणों का भय है, ना कल का और ना कलंक का…..लेकिन शायद तुम डरे हुए हो….
रत्नाकर ने गुस्से में कहा – मैं डरा हुआ नहीं हूँ, मुझे भला किसका डर है ?
नारद मुनि – अगर डरे नहीं हो तो इन जंगलों में छिप कर क्यों बैठे हो ? शायद तुम राजा से डरते हो या फिर प्रजा से
रत्नाकर – नहीं मैं किसी से भी नहीं डरता
नारद मुनि ने मुस्कुरा के कहा – तुम पाप करते हो और तुम पाप से ही डरते हो इसलिए तुम यहाँ छिप कर बैठे हो लेकिन शायद तुमको नहीं पता कि इस पाप के केवल तुम ही भागीदार हो। इसका दण्ड तुमको अकेले भुगतना होगा कोई भी तुम्हारा साथ नहीं देगा।
रत्नाकर ने गुस्से में कहा – तुम मुझे उकसा रहे हो ब्राह्मण….मैं ये सब काम अपने परिवार का पेट पलने के लिए करता हूँ और मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरे पिता सभी इस काम में मेरे साथ हैं।
नारद मुनि ने कहा – सुनो रत्नाकर, मुझे अपने प्राणों का भय नहीं है, तुम मुझे यहाँ पेड़ से बांध कर अपने घर जाओ और अपने सभी सगे सम्बन्धियों से पूछो कि क्या वह इस पाप में तुम्हारे साथ हैं?
रत्नाकर को नारद मुनि की बात सही लगी और वह उनको पेड़ से बाँधकर अपने घर की ओर चल दिया। घर जाकर उसने सबसे पहले अपनी पत्नी से पूछा कि मैं जो ये पाप करता हूँ क्या तुम उस पाप में मेरे साथ हो ? तो पत्नी ने उत्तर दिया कि स्वामी आप इस परिवार के पालक हैं ये तो आपका कर्तव्य है इस पाप में मेरा कोई हिस्सा नहीं है।
रत्नाकर बेचारा उदास सा होकर अपने पिता के पास पहुँचा और उनसे भी यही सवाल पूछा तो पिता ने कहा – बेटा ये तो तेरी कमाई है, इस पाप में हमारा कोई हिस्सा नहीं है।
डाकू रत्नाकर के प्राण सूख गए उसे ये सब सुनकर बहुत बड़ा धक्का लगा कि वह जिनके लिए ये पाप कर रहा है वो उसके पाप में भागीदार होने को तैयार नहीं हैं। रत्नाकर हताश होकर वापस नारद मुनि के पास गया और नारद मुनि के पाँव में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा।
नारद मुनि ने उसे उठाया और सत्य का ज्ञान दिया। नारद मुनि ने कहा – सुनो रत्नाकर, इस धरती पर तुम जो भी कार्य करते हो, चाहे गलत या सही, सबका पाप और पुण्य तुमको ही मिलेगा। अपने सभी कुकृत्यों के लिए तुम ही जिम्मेदार हो। तुमने पुराने जीवन में जो कुछ पाप किये उसके जिम्मेदार भी तुम हो और आगे आने वाले जीवन में जो भी करोगे उसके भी जिम्मेदार अकेले तुम ही होंगे।
नारद मुनि ने रत्नाकर को सत्य से परिचित कराया और उन्हें "राम" का नाम जपने का उपदेश भी दिया। रत्नाकर से "राम" नाम लिया ही नहीं जाता था तो नारद मुनि ने उसे "मरा मरा" का उच्चारण करने को कहा और "मरा मरा" जपते हुए यही रत्नाकर राम नाम का जाप करने लगा और आगे जाकर यही रत्नाकर महर्षि "वाल्मीकि" के नाम ये प्रसिद्ध हुआ।
महर्षि वाल्मीकि आदिकाल के सबसे उच्च ऋषि हैं। वह संस्कृत के विद्वान कवि और दुनिया के सबसे बड़े ग्रन्थ "रामायण" के रचयिता हैं। महर्षि वाल्मीकि ने ही हिंदुओं के सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ "रामायण" को संस्कृत में लिखा।
सत्य ही कहा गया है "राम" नाम के इस शब्द में बहुत बल है जिसने डाकू को भी भारतवर्ष के सबसे प्रमुख ऋषि के रूप में परिवर्तित कर दिया।

Bhawesh Aggarwal

CEO & Co-founder of Ola.
Bhavish graduated with a B.Tech in Computer Science and Engineering from IIT Bombay in 2008 and worked at Microsoft Research for 2 years after that, filing 2 patents and publishing 3 papers in International Journals. Sensing the need to change the way transportation is consumed in India and create a choice of reliable personal transportation in a country that's as unique as India, Bhavish quit his job in August 2010 to start Ola!
Within 3 years, Ola is India's largest network of personal transportation options and also the most popular app amongst customers and users in over 22 cities of its operations.
Bhavish was featured as one of Hindustan Times' 30 Achievers under 30 as well as in the Forbes India list of 30 under 30.
Social :  Facebook, Twitter & LinkedIn.

सुविचार

जो *पिता* के पैरों को छूता है
           वो कभी *गरीब* नहीं होता।

जो *मां* के पैरों को छूता है 
         वो कभी *बदनसीब* नही होता।

जो *भाई* के पैराें को छूता है 
         वो कभी *गमगीन* नही होता।

जो *बहन* के पैरों को छूता है 
       वो कभी *चरित्रहीन* नहीं होता। 

*जो गुरू के पैरों को छूता है*
         *उस जैसा कोई*
                *खुशनसीब नहीं होता*.......

💞अच्छा *दिखने* के लिये मत जिओ 
          बल्कि *अच्छा* बनने के लिए जिओ💞

 💞जो *झुक* सकता है वह सारी 
          ☄दुनिया को *झुका* सकता है 💞


 💞 अगर बुरी आदत *समय पर न बदली* जाये 
          तो बुरी आदत *समय बदल देती* है💞


  💞चलते रहने से ही *सफलता* है,
          रुका हुआ तो पानी भी *बेकार* हो जाता है 💞

💞 *झूठे दिलासे* से *स्पष्ट इंकार* बेहतर है
   अच्छी *सोच*, अच्छी *भावना*,
          अच्छा *विचार* मन को हल्का करता है💞

💞मुसीबत सब पर आती है,
          कोई *बिखर* जाता है 
            और कोई *निखर* जाता है💞
💞दुनिया की ताकतवर चीज है *"लोहा"*🔩
       जो सबको काट डालता है ....
लोहे से ताकतवर है *"आग"*🔥
        💞जो लोहे को पिघला देती है....💞
💞आग से ताकतवर है *"पानी"*🌧
        ☄जो आग को बुझा देता है.... 💞
💞और पानी से ताकतवर है *"इंसान"*
        जो उसे पी जाता है....💞
💞इंसान से भी ताकतवर है *"मौत"*
         जो उसे खा जाती है....💞
💞और मौत से भी ताकतवर है *"दुआ"* 
      जो मौत को भी टाल सकती है...💞

 💞 "तेरा मेरा"करते एक दिन चले जाना है...
         जो भी कमाया यही रह जाना है💞
      *💞कर ले कुछ अच्छे कर्म💞*
      *💞साथ यही तेरे आना है💞*

        *💞मुझे वो 👌🏼रिश्ते पसंद है,*
    *जिनमें "मैं" नहीं "हम"हो💞*✍🏻


💞💞💞💞💞💞💞

दोहे

आदि रूप की परम दुति, घट-घट रहा समाइ ।
लघु मति ते मो मन रसन, अस्‍तुति कही न जाइ ।।1।।

नैन तृप्ति कछु होतु है, निरखि जगत की भाँति ।
जाहि ताहि में पाइयै, आदि रूप की काँति ।।2।।

उत्‍तम जाती ब्राह्मनी, देखत चित्‍त लुभाय ।
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाय ।।3।।

परजापति परमेश्‍वरी, गंगा रूप-समान ।
जाके अंग-तरंग में, करत नैन अस्‍नान ।।4।।

रूप-रंग-रति-राज में, खतरानी इतरान ।
मानों रची बिरंचि पचि, कुसुम कनक मैं सान ।।5।।

पारस पाहन की मनो, धरै पूतरी अंग ।
क्‍यों न होई कंचल पहू, जो बिलसै तिहि संग ।।6।।

कबहुँ दिखावै जौहरिन, हँसि हँसि मानिक लाल ।
कबहूँ चख ते च्‍वै परै, टूटि मुकुत की माल ।।7।।

जद्यपि नैननि ओट है, बिरह चोट बिन घाइ ।
पिय उर पीरा ना करै, हीरा सी ग‍ड़ि जाइ ।।8।।

कैथिनी कथन न पारई, प्रेम-कथा मुख बैन ।
छाती ही पाती मनो, लिखै मैन की सैन ।।9।।

बरूनि-बार लेखनि करै, मसि काजरि भरि लेइ ।
प्रेमाखर लिखि नैन ते, पिय बाँचन को देह ।।10।।

चतुर चितेरिन चित हरै चख खंजन के भाइ ।
द्वै आधौ करि डारई, आधौ मुख दिखराइ ।।11।।

पलक न टारै बदन तें, पलक न मारै नित्र ।
नेकु न चित तें ऊतरै, ज्‍यों कागद में चित्र ।।12।।

सुरंग बरन बरइन बनी, नैन खवाये पान ।
निसि दिन फेरै पान ज्‍यों, बिरही जन के प्रान ।।13।।

पानी पीरी अति बनी, चंदन खौरे गात ।
परसत बीरी अधर की, पीरी कै ह्वै जात ।।1411

परम रूप कंचन बरन, सोभित नारि सुनारि ।
मानों साँचे ढारि कै, बिधिना गढ़ी सुनारि ।।15।।

रहसनि बहसनि मन हरै, घेरि घेरि तन लेहि ।
औरन को चित चोरि कै, आपुन चित्‍त न देहि ।।16।।

बनिआइन बनि आइ कै, बैठि रूप की हाट ।
पेम पेक तन हेरि कै, गरुए टारत बाट ।।17।।

गरब तराजू करत चख, भौंह मोरि मुसक्‍यात ।
डाँड़ी मारत बिरह की, चित चिन्‍ता घटि जात ।।18।।

रँग रेजिन के संग में, उठत अनंग तरंग ।
आनन ऊपर पाइयतु, सुरत अंत के रंग ।।19।।

मारति नैन कुरंग तैं, मो मन मार मरोरि ।
आपुन अधर सुरंग तैं, कामिहिं काढ़ति बोरि ।।20।।

गति गरूर गजराज जिमि, गोरे बरन गँबारि ।
जाके परसत पाइयै, धनवा की उनहारि ।।21।।

घरो भरो धरि सीस पर, बिरही देखि लजाइ ।
कूक कंठ तैं बाँधि कै, लेजू ज्‍यों लै जाइ ।।22।।

भाटा बरन सुकौंजरी, बेचै सोवा साग ।
निलजु भई खेलत सदा, गारी द दै फाग ।।23।।

हरी भरी डलिया निरखि, जो कोई नियरात।
झूठे हू गारी सुनत, साँचेहू ललचात ।।24।।

बनजारी झुमकत चलत, जेहरि पहिरै पाइ ।
वाके जेहरि के सबद, बिहरी जिय हर जाइ ।।25।।

और बनज ब्‍यौपार को, भाव बिचारै कौन ।
लोइन लोने होत है, देखत वाको लौन ।।26।।

बर बाँके माटी भरे, कौंरी बैस कुम्‍हारि ।
द्वै उलटै सरवा मनौ, दीसत कुच उनहारि ।।27।।

निरखि प्रान घट ज्‍यों रहै, क्‍यों मुख आवै बाक ।
उर मानौं आबाद है, चित्‍त भ्रमैं जिमि चाक ।।28।।

बिरह अगिन निसि दिन धवै, उठै चित्‍त चिनगारि ।
बिरही जियहिं जराइ कै, करत लुहारि लुहारि ।।29।।

राखत मो मन लोह-सम, पारि प्रेम घन टोरि ।
बिरह अगिन में ताइकै, नैन नीर में बोरि ।।30।।

कलवारी रस प्रेम कों, नैनन भरि भरि लेति ।
जोबन मद माती फिरै, छाती छुवन न देति ।।31।।

नैनन प्‍याला फेरि कै, अधर गजक जब देइ ।
मतवारे की मत हरै, जो चाहै सो लेइ ।।32।।

परम ऊजरी गूजरी, दह्यौ सीस पै लेइ ।
गोरस के मिस डोलही, सो रस नेकु न देइ ।।33।।

गाहक सों हँसि बिहँसि कै, करति बोल अरु कौल ।
पहिले आपुन मोल कहि, क‍हति दही को मोल ।।34।।

काछिनि कछू न जानई, नैन बीच हित चित्‍त ।
जोबन जल सींचति रहै, काम कियारी नित्‍त ।।35।।

कुच भाटा, गाजर अधर, मूरा से भुज भाइ ।
बैठी लौका बेचई, लेटी खीरा खाइ ।।36।।

हाथ लिये हत्‍या फिरै, जोबन गरब हुलास ।
धरै कसाइन रैन दिन बिरही रकत पियास ।।37।।

नैन कतरनी साजि कै, पलक सैन जब देइ ।
बरुनी की टेढ़ी छुरी, लेह छुरी सो टेइ ।।38।।

हियरा भरै तबाखिनी, हाथ न लावन देत ।
सुरवा नेक चखाइकै, हड़ी झारि सब देत ।।39।।

अधर सुधर चख चीकनै, दूभर हैं सब गात ।
वाको परसो खात हू, बिरही नहिं न अघात ।।40।।

बेलन तिली सुबासि कै, तेलिन करै फुलैल ।
बिरही दृष्टि फिरौ करै, ज्‍यों तेली को बैल ।।41।।

कबहूँ मुख रूखौ किये, कहै जीय की बात ।
वाको करुआ बचन सुनि, मुख मीठो ह्वै जात ।।42।।

पाटम्‍बर पटइन पहिरि, सेंदुर भरे ललाट ।
बिरही नेकु न छाँड़ही, वा पटवा की हाट ।।43।।

रस रेसम बेंचत रहै, नैन सैन की सात ।
फूंदी पर को फोंदना, करै कोटि जिय घात ।।44।।

भटियारी अरु लच्‍छमी, दोऊ एकै घात ।
आवत बहु आदर करै, जात न पूछै बात ।।45।।

भटियारी उर मुँह करै, प्रेम-पथिक के ठौर ।
द्यौस दिखावै और की, रात दिखावै और ।।46।।

करै गुमान कमाँगरी, भौंह कमान चढ़ाइ ।
पिय कर गहि जब खैंचई, फिरि कमान सी जाइ ।।47।।

जोगति है पिय रस परस, रहै रोस जिय टेक ।
सूधी करत कमान ज्‍यों, बिरह-अगिन में सेंक ।।48।।

हँसि हँसि मारै नैन-सर, बारत जिय बहु पीर ।
बेझा ह्वै उर जात है, तीरगरिन कै तीर ।।49।।

प्रान सरीकन साल दै, हेरि फेरि कर लेत ।
दुख संकट पै का‍ढि के, सुख सरेस में देत ।।50।।

छीपिन छापौ अधर को, सुरँग पीक भरि लेइ ।
हँसि हँसि काम कलोल में, पिय मुख ऊपर देइ ।।51।।

मानों मूरति मैन की, धरै रंग सुरतंग ।
नैन रंगीले होतु हैं, देखत वाको रंग ।।52।।

सकल अंग सिकलीगरिन, करत प्रेम औसेर ।
करै बदन दर्पन मनों, नैन मुसकिला फेरि ।।53।।

अंजनचख, चंदन बदन, सोभित सेंदुर मंग ।
अंगनि रंग सुरंग कै, काढ़ै अंग अनंग ।।54।।

करै न काहू की संका, सक्किन जोबन रूप ।
सदा सरम जल तें भरी, रहै चिबुक को कूप ।।55।।

सजल नैन वाके निरखि, चलत प्रेम रस फूटि ।
लोक लाज डर धाकते, जात मसक सी छूटि ।।56।।

सुरँग बसन तन गाँधिनी, देखत दृग न अघाय ।
कुच माजू, कुटली अधर, मोचत चरन न आय ।।57।।

कामेश्‍वर नैननि धरै, करत प्रेम की केलि ।
नैन माहि चोवा भरे, चिहुरन माहिं फुलेल ।।58।।

राज करत रजपूतनी देस रूप की दीप ।
कर घूँघट पट ओट कै, आवत पियहि समीप ।।59।।

सोभित मुख ऊपर धरै, सदा सुरत मैदान ।
छूटी लटैं बँदूकची, भोंहें रूप कमान ।।60।।

चतुर चपल कोमल बिमल, पग परसत सतराइ ।
रस ही रस बस कीजियै, तुरकिन तरकि न जाइ ।।61।।

सीस चूँदरी निरखि मन, परत प्रेम के जार ।
प्रान इजारो लेत है, वाको लाल इजार ।।62।।

जोगिन जोग न जानई, परै प्रेम रस माँहि ।
डोलत मुख ऊपर लिये, प्रेम जटा की छाँहि ।।63।।

मुख पै बैरागी अलक, कुच सिंगो विष बैन ।
मुदरा धारै अधर कै, मूँदि ध्‍यान सों नैन ।।64।।

भाटिन भटकी प्रेम की, हटकी रहै न गेह ।
जोबन पर लटकी फिरै, जोरत तरकि सनेह ।।65।।

मुक्‍त माल उर दोहरा, चौपाई मुख-लौन ।
आपुन जोबन रूप को, अस्‍तुति करै न कौन ।।66।।

लेत चुराये डोमनी, मोहन रूप सुजान ।
गाइ गाइ कछु लेत है, बाँकी तिरछी तान ।।67।।

नैकु न सूधे मुख रहै, झुकि हँसि मुरि मुसक्‍याइ ।
उपपति की सुन जात है, सरबस लेइ रिझाइ ।।68।।

चेरी माती मैन की, नैन सैन के भाइ ।
संक भरी जंभुवाइ कै, भुज उठाइ अँगराइ।।69।।

रंग रंग राती फिरै, चित्‍त न लावै गेह ।
सब काहू तें कहि फिरै, आपुन सुरत सनेह ।।70।।

बाँस चढ़ी नट-नंदनी, मन बाँधत लै बाँस ।
नैन मैन की सैन तें, मटत कटाछन साँस ।।71।।

अलबेली उद्भुत कला, सुध बुध लै बरजार ।
चोरि चोरि मन लेत है, ठौर ठौर तन तोर ।।72।।

बोलनि पै पिय मन विमल, चितवनि चित्‍त समाय ।
निसि वासर हिंदू तुरक, कौतुक देखि लुभाय ।।73।।

लटकि लेइ कर दाइरौ, गावत अपनी ढाल ।
सेत लाल छबि दीसियतु, ज्‍यों गुलाल की माल ।।74।।

कंचन से तन कंचनी, स्‍याम कंचुकी अंग ।
भाना भामै भोरही, रहै घटा के संग ।।75।।

नैननि भीतर नृत्‍य कै, सैन देत सतराय ।
छवि तै चित्‍त छुड़ावही, नट के भाय दिखाय ।।76।।

हरि गुन आवज केसवा, हिंसा बाजत काम ।
प्रथम विभासै गाइके, करत जीत संग्राम ।।77।।

प्रेम अहेरी साजि कै, बाँध परयो रस तान ।
मन मृग ज्‍यों रीझै नहीं, तोहि नैन के बान ।।78।।

मिलत अंग सब अंगना, प्रथम माँगि मन लेइ ।
घेरि घेरि उर राख ही, फेरि फेरि उर देइ ।।79।।

बहु पतंग जारत रहै, दीपक बारै देह ।
फिर तन-गेह न आवही, मन जु चैटुवा लेह ।।80।।

प्राँन-पूतरी पातुरी, पातुर कला निधान।
सुरत अंग चित चोरई, काय पाँच रसवान ।।81।।

उपजावै रस में बिरस, बिरस माहिं रस नेम ।
जो कीजै बिपरीत रति, अतिहि बढ़ावत प्रेम ।।82।।

कहै आन की आन कछु, बिरह पीर तन ताप ।
औरे गाइ सुनावई, औरे कछू अलाप ।।83।।

जुँकिहारी जोबन लये, हाथ फिरै रस देत ।
आपुन मास चखाइ कै, रकत आन को लेत ।।84।।

बिरही के उर में पड़ै, स्‍याम अलक की नोक ।
बिरह पीर पर लावई, रकत पियासी जोंक ।।85।।

विरह विथा खटकिन कहै, पलक न लावै रैन ।
करत कोप बहु भाँति ही, धाइ मैन की सैन ।।86।।

विरह विथा कोई कहै, समुझै कछू न ताहि ।
वाके जोबन रूप की, अकथ कथा कछु आहि ।।87।।

जाहि ताहि के उर गड़ै, कुंदिन बसन मलीन ।
निस दिन वाके जाल में, परत फँसत मन मीन ।।88।।

जा वाके अँग संग में, धरै प्रीत की आस ।
वाको लागै महमही, बसन बसेधी बास ।।89।।

सबै अंग सबनीगरनि, दीसत मनन कलंक ।
सेत बसन कीने मनो, साबुन लाइ मतंग ।।90।।

विरह बिथा मन की हरै, महा विमल ह्वै जाइ ।
मन मलीन जो धोवई, वाकौ साबुन लाइ ।।91।।

थोरे थोरे कुच उठी, थोपिन की उर सींव ।
रूप नगर में देत है, नैन मंदिर को नींव ।।92।।

करत बदन सुख सदन पै, घूँघट नितरन छाँह ।
नैननि मूँदे पग धरै, भौंहन आरै माँह ।।93।।

कुन्‍दनसी कुन्‍दीगरिन, कामिनि कठिन कठोर ।
और न काहू की सुनै, अपने पिय के सोर ।।94।।

पगहि मौगरी सो रहै, पम बज्र बहु खाइ ।
रँग रँग अंग अनंग के, करै बनाइ बनाइ ।।95।।

धुनियाइन धुनि रैन दिन, धरै सुरति की भाँति ।
वाको राग न बूझही, कहा बजावै ताँति ।।96।।

काम पराक्रम जब करै, छुवत नरम हो जाइ ।
रोम रोम पिय के बदन, रूई सी लपटाइ ।।97।।

कोरिन कूर न जानई, पेम नेम के भाइ ।
बिरही वाके भौन में, ताना तनत बजाइ ।।98।।

बिरह भार पहुँचे नहीं, तानी बहै न पेम ।
जोबन पानी मुख धरै, खैंचे पिय के नैन ।।99।।

जोबन युत पिय दब‍गरिन, कहत पीय के पास ।
मो मन और न भावई, छाँ‍डि तिहारी बास ।।100।।

भरी कुपी कुच पीन की, कंचुक में न समाइ ।
नव सनेह असनेह भरि, नैन कुपा ढरि जाइ ।।101।।

घेरत नगर नगारचिन, बदन रूप तन साजि ।
घर घर वाके रूप को, रह्यौ नगारा बाजि ।।102।।

पहनै जो बिछुवा खरी, पित के संग अंगरात ।
रतिपति की नौबत मनो, बाजत आधी रात ।।103।।

मन दलमलै दलालिनी, रूप अंग के भाइ ।
नैन मटकि मुख की चटकि, गाहक रूप दिखाइ ।।104।।

लोक लाज कुलकानि तैं, नहीं सुनावति बोल ।
नैननि सैननि में करै, बिरही जन को मोल ।।105।।

निसि दिन रहै ठठेरिनी, साजे माजे गात ।
मुकता वाके रूप को, थारी पै ठहरात ।।106।।

आभूषण बसतर पहिरि, चितवति पिय मुख ओर ।
मानो गढ़े नितंब कुच, गडुवा ढार कठोर ।।107।।

कागद से तन कागदिन, रहै प्रेम के पाइ ।
रीझी भीजी मैन जल, कागद सी सिथलाइ ।।108।।

मानों कागद की गुड़ी, चढ़ी सु प्रेम अकास ।
सुरत दूर चित खैंचई, आइ रहै उर पास ।।109।।

देखन के मिस मसिकरिन, पुनि भर मसि खिन देत ।
चख टौना कछु डारई, सूझै स्‍याम न सेत ।।110।।

रूप जोति मुख पै धरै, छिनक मलीन न होत ।
कच मानो काजर परै, मुख दीपक की जोति ।।111।।

बाजदारिनी बाज पिय, करै नहीं तन साज ।
बिरह पीर तन यों रहै, जर झकिनी जिमि बाज ।।112।।

नैन अहेरी साजि कै, चित पंछी गहि लेत ।
बिरही प्रान सचान को, अधर न चाखन देत ।।113।।

जिलेदारिनी अति जलद, बिरह अगिन कै तेज ।
नाक न मोरै सेज पर, अति हाजर महिमेज ।।114।।

औरन को घर सघन मन, चलै जु घूँघट माँह‍ ।
वाके रंग सुरंग को, जिलेदार पर छाँह ।।115।।

सोभा अंग भँगेरिनी, सोभित भाल गुलाल ।
पता पीसि पानी करै, चखन दिखावै लाल ।।116।।

काहू अधर सुरंग धरि, प्रेम पियालो देत ।
काहू की गति मति सुरत, हरुवैई हरि लेत ।।117।।

बाजीगरिन बजार में, खेलत बाजी प्रेम ।
देखत वाको रस रसन, तजत नैन व्रत नेम ।।118।।

पीवत वाको प्रेम रस, जोई सो बस होइ ।
एक खरे घूमत रहै, एक परे मत खोइ ।।119।।

चीताबानी देखि कै, बिरही रहे लुभाय ।
गाड़ी को चीतो मनो, चलै न अपने पाय ।।120।।

अपनी बैसि गरूर तें, गिनै न काहू मित्‍त ।
लाँक दिखावत ही हरै, चीता हू को चित्‍त ।।121।।

कठिहारी उर की कठिन, काठ पूतरी आहि ।
छिनक ज पिय सँग ते टरैं, बिरह फँदे नहिं ताहि ।।122।।

करै न काहू को कह्यौ, रहे कियै हिय साथ ।
बिरही को कोमल हियो, क्‍यों न होइ जिम काठ ।।123।।

घासिन थोरे दिनन की, बैठी जोबन त्‍यागि ।
थोरे ही बुझि जात है, घास जराई आग ।।124।।

तन पर काहू ना गिनै, अपने पिय के हेत ।
हरवर बेड़ो बैस को, थोरे ही को देत ।।125।।

रीझी रहै डफालिनी, अपने पिय के राग ।
ना जानै संजोग रस, ना जानै बैराग ।।126।।

अनमिल बतियाँ सब करैं, नाहीं मलिन सनेह ।
डफली बाजै बिरह की, निसि दिन वाके गेह ।।127।।

बिरही के उर में गड़ै ग‍डिबारिनको नेह ।
शिव-बाहन सेवा करै, पावै सिद्धि सनेह ।।128।।

पैम पीर वाकी जनौ, कंटकहू नगड़ाइ ।
गाड़ी पर बैठै नहीं, नैननि सो ग‍ड़ि जाइ ।।129।।

बैठी महत महावतिन, धरै जु आपुन अंग ।
जोबन मद में गलि चढ़ी, फिरै जु पिय के संग ।।130।।

पीत कॉंछि कंचुक तनहि, बाला गहे कलाब ।
जाहि ताहि मारत फिरै, अपने पिय के ताब ।।131।।

सरवानी विपरीत रस, किय चाहै न डराइ ।
दुर न विरही को दुर्यौ, ऊँट न छाग समाय ।।132।।

जाहि ताहि कौ चित्‍त हरै, बाँधे प्रेम कटार ।
वित आवत गहि खैंचई, भरि कै गहै मुहार ।।133।।

नालबंदिनी रैन दिन, रहै सखिन के नाल ।
जोबन अंग तुरंग की, बाँधन देइ न नाल ।।134।।

चोली माँहि चुरावई, चिरवादारिनि चित्‍त ।
फेरत वाके गात पर, काम खरहरा नित्‍त ।।135।।

सारी निसि पिय संग रहै, प्रेम अंग आधीन।
मठी माहिं दिखावही, बिरही को कटि खीन ।।136।।

धोबिन लुबधी प्रेम की, नाघर रहै न घाट ।
देत फिरै घर घर बगर, लुगरा धरै लिलार ।।137।।

सुरत अंग मुख मोरि कै, राखै अधर मरोरि ।
चित्‍त गदहरा ना हरै, बिन देखे वा ओर ।।138।।

चोरति चित्‍त चमारिनी, रूप रंग के साज ।
लेत चलायें चाम के, दिन द्वै जोबन राज ।।139।।

जावै क्‍यों नहीं नेम सब, होइ लाज कुल हानि।
जो वाके संग पौढ़ई, प्रेम अधोरी तानि ।।140।।

हरी भरी गुन चूहरी, देखत जीव कलंक ।
वाके अधर कपोल को, चुवौ परै जिम रंग ।।141।।

परमलता सी लहलही, धरै पैम संयोग ।
कर गहि गरै लगाइयै हरै विरह को रोग ।।142।।

रूपरंग रति राज में, छ्तरानी इतरान ।
मानौ रची बिरंचि पचि,कुसुम कनक में सान।।143।।

बनियाइनि बनि आईकै, बैठि रूप की हाट।
पेम पक तन हेरिकै,गरुवे टारति बाट।।144।। 

गरब तराजू करति चख,भौंह मोरि मुस्काति।
डांडी मार ति विरह की,चित चिंता घटि जाति।।145।।
                                             
                                                  📝  रहीम खान

रसखान के कृष्ण

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन

पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन

जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन
।।

 

हिन्दी के कृष्ण भक्त तथा रीतिकालीन रीतिमुक्त कवियों में रसखान का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। रसखान को रस की खान कहा गया है। इनके काव्य में भक्तिश्रृगांर रस दोनों प्रधानता से मिलते हैं। रसखान कृष्ण भक्त हैं और उनके सगुण और निगुर्ण निराकार रूप दोनों के प्रति श्रध्दावनत हैं। रसखान के सगुण कृष्ण वे सारी लीलाएं करते हैंजो कृष्ण लीला में प्रचलित रही हैं। यथा - बाललीलारासलीलाफागलीलाकुंजलीला आदिउन्होंने अपने काव्य की सीमित परिधी में इन असीमित लीलाओं को बखूबी बाँधा है

रसखान का अपने आराध्य के प्रति इतना गम्भीर लगाव है कि ये प्रत्येक स्थिति में उनका सान्निध्य चाहते हैंचाहे इसके लिये इन्हें कुछ भी परिणाम सहना पडे। इसीलिये कहते हैं कि आगामी जन्मों में मुझे फिर मनुष्य की योनि मिले तो मैं गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहने का सुयोग मिले। अगर पशु योनि मिले तो मुझे ब्रज में ही रखना प्रभु ताकि मैं नन्द की गायों के साथ विचरण कर सकूँ। अगर पत्थर भी बनूं तो भी उस पर्वत का बनूँ जिसे हरि ने अपनी तर्जनी पर उठा ब्रज को इन्द्र के प्रकोप से बचाया था। पक्षी बना तो यमुना किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहीं सकती बसेरा करने के लिये

इसी प्रकार रसखान ने समस्त शारीरिक अवयवों तथा इन्द्रियों की सार्थकता तभी मानी हैजिनसे कि वे प्रभु के प्रति समर्पित रह सकें

जो रसना रस ना बिलसै तेविं बेहु सदा निज नाम उचारै
मो कर नीकी करैं करनी जु पै कुंज कुटीरन देहु बुहारन

सिध्दि समृध्दि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका अंग सवारन

खास निवास मिले जु पै तो वही कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन
।।

रसखान अपने आराध्य से विनती करते हैं कि मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो ताकि मेरी जिव्हा को रस मिले। मुझे अपने कुंज कुटीरों में झाडू लगा लेने दो ताकि मेरे हाथ सदा अच्छे कर्म कर सकें। ब्रज की धूल से अपना शरीर संवार कर मुझे आठों सिध्दियों का सुख लेने दो। और यदि निवास के लिये मुझे विशेष स्थान देना ही चाहते हो प्रभु तो यमुना किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहींहाँ आपने अनेकों लीलाएं रची हैं

रसखान के कृष्ण की बाललीला में उनके बचपन की अनेकों झाँकियां हैं

धूरि भरै अति सोभित स्याम जु तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैंजनी बाजती पीरी कछौटी।
वा छवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोठी।
काग के भाग बडे सजनी हरि हाथ सौं ले गयो रोटी।।

बालक श्यामजू का धूल से सना शरीर और सर पर बनी सुन्दर चोटी की शोभा देखने लायक है। और वे पीले वस्त्रों मेंपैरों में पायल बांध माखन रोटी खेलते खाते घूम रहे हैं। इस छवि पर रसखान अपनी कला क्यासब कुछ निछावर कर देना चाहते हैं। तभी एक कौआ आकर उनके हाथ से माखन-रोटी ले भागता है तो रसखान कह उठते हैं कि देखो इस निकृष्ट कौए के भाग्य भगवान के हाथ की रोटी खाने को मिली है

कृष्ण के प्रति रसखान का प्रेम स्वयं का तो है ही मगर वह गोपियों का प्रेम बन कृष्ण की बाल्यावस्था से यशोदा नन्द बाबा के प्रेम से आगे जा समस्त ब्रज को अपने प्रेम में डुबो ले जाता है। उनकी शरारतों की तो सीमा नहीं। वे गोपियों को आकर्षित करने के लिये विविध लीलाएं करते हैं जैसे कभी बाँसुरी के स्वरों से किसी गोपी का नाम निकालते हैं। कभी रास रचते हैं,कभी प्रेम भरी दृष्टि से बींध देते हैं

अधर लगाई रस प्याई बाँसुरी बजाय,
 मेरो नाम गाई हाय जादू कियौ मन में।
नटखट नवल सुघर नन्दनवन में
 करि कै अचेत चेत हरि कै जतम मैं।
झटपट उलटि पुलटी परिधान,
 जानि लागीं लालन पे सबै बाम बन मैं।
रस रास सरस रंगीली रसखानि आनि,
 जानि जोर जुगुति बिलास कियौ जन मैं।

एक गोपी अपनी सखि से कहती है कि कृष्ण ने अपने अधरों से रस पिला कर जब बाँसुरी में मेरा नाम भर कर बजाया तो मैं सम्मोहित हो गई। नटखट युवक कृष्ण की इस शरारत से अचेत मैं हरि के ध्यान में ही खो गईऔर बांसुरी के स्वर सुन हर गोपी को लगा कि उसे कृष्ण ने बुलाया है तो सब उलटे सीधे कपडे ज़ल्दी जल्दी पहनसमय का खयाल न रख वन में पहुँच गईं। तब रंगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रासलीला की और नृत्य संगीत से आनंद का वातावरण बना दिया

रंग भरयौ मुस्कात लला निकस्यौ कल कुंज ते सुखदाई।
मैं तबहीं निकसी घर ते तनि नैन बिसाल की चोट चलाई।
घूमि गिरी रसखानि तब हरिनी जिमी बान लगैं गिर जाई।
टूट गयौ घर को सब बंधन छुटियो आरज लाज बडाई।।

गोपी अपने हृदय की दशा का वर्णन करती है। जब मुस्कुराता हुआ कृष्ण सुख देने वाले कुंज से बाहर निकला तो संयोग से मैं भी अपने घर से निकली। मुझे देखते ही उसने मुझ पर अपने विशाल नेत्रों के प्रेम में पगे बाण चलाए मैं सह न सकी और जिस प्रकार बाण लगने पर हिरणी चक्कर खा कर भूमि पर गिरती है,उसी प्रकार मैं भी अपनी सुध-बुध खो बैठी। मैं सारे कुल की लाज और बडप्पन छोड क़ृष्ण को देखती रह गई

रसखान ने रासलीला की तरह फागलीला में भी कृष्ण और गोपियों के प्रेम की मनोहर झाँकियां प्रस्तुत की हैं

खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को ता मुख की उपमा किहिं दीजै।
दैखति बनि आवै भलै रसखान कहा है जौ बार न कीजै।।
ज्यौं ज्यौं छबीली कहै पिचकारी लै एक लई यह दूसरी लीजै।
त्यौं त्यौं छबीलो छकै छबि छाक सौं हेरै हँसे न टरै खरौ भीजै।।

एक गोपी अपनी सखि से राधा-कृष्ण के फाग का वर्णन करते हुए बताती है - हे सखि! मैं ने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा का फाग खेलते हुए देखा हैउस समय की उस शोभा को कोई उपमा नहीं दी जा सकती। और कोई ऐसी वस्तु नहीं जो उस स्नेह भरे फाग के दृश्य पर निछावर नहीं की जा सके। ज्यों ज्यों सुन्दरी राधा चुनौती दे देकर एक के बाद दूसरी पिचकारी चलाती हैंवैसे वैसे छबीला कृष्ण उनके उस रंग भरे रूप को छक कर पीता हुआ वहीं खडा मुस्कुरा कर भीगता रहता है

रसखान के भक्ति काव्य में अलौकिक निगुर्ण कृष्ण भी विद्यमान हैं। वे कहते हैं -

संभु धरै ध्यान जाकौ जपत जहान सब,
 ताते न महान और दूसर अब देख्यौ मैं।
कहै रसखान वही बालक सरूप धरै,
 जाको कछु रूप रंग अबलेख्यौ मैं।
कहा कहूँ आली कुछ कहती बनै न दसा,
 नंद जी के अंगना में कौतुक एक देख्यौ मैं।
जगत को ठांटी महापुरुष विराटी जो,
 निरजंन, निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं।

शिव स्वयं जिसे अराध्य मान उनका ध्यान करते हैं,सारा संसार जिनकी पूजा करता हैजिससे महान कोई दूसरा देव नहीं। वही कृष्ण साकार रूप धार कर अवतरित हुआ है और अपनी अद्भुत लीलाओं से सबको चौंका रहा है। यह विराट देव अपनी लीला के कौतुक दिखाने को नंद बाबा के आंगन में मिट्टी खाता फिर रहा है

गावैं गुनि गनिका गंधरव औ नारद सेस सबै गुन गावत।
नाम अनंत गनंत ज्यौं ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत।
जोगी जती तपसी अरु सिध्द निरन्तर जाहि समाधि लगावत।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत।

जिस कृष्ण के गुणों का गुणगान गुनिजनअप्सरागंर्धव और स्वयं नारद और शेषनाग सभी करते हैंगणेश जिनके अनन्त नामों का जाप करते हैंब्रह्मा और शिव भी जिसके स्वरूप की पूर्णता नहीं जान पातेजिसे प्राप्त करने के लिये योगीयतितपस्वी और सिध्द निरतंर समाधि लगाए रहते हैंफिर भी उस परब्रह्म का भेद नहीं जान पाते। उन्हीं के अवतार कृष्ण को अहीर की लडक़ियाँ थोडी सी छाछ के कारण दस बातें बनाती हैं और नाच नचाती हैं

एक और सुन्दर उदाहरण -

वेही ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत हैं रैन दिन,
 सदासिव सदा ही धरत ध्यान गाढे हैं।
वेई विष्णु जाके काज मानि मूढ राजा रंक,
 जोगी जती व्हैके सीत सह्यौ अंग डाढे हैं।
वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्रानन के,
 जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढे हैं।
जसुदा के आगे वसुधा के मान मोचन ये,
 तामरस-लोचन खरोचन को ठाढे हैं।

कृष्ण की प्राप्ति के लिये सारा ही जगत प्रयत्नशील हैये वही कृष्ण हैं जिनकी पूजा ब्रह्मा जी दिन रात करते हैं। सदाशिव जिनका सदा ही ध्यान धरे रहते हैं। यही विष्णु के अवतार कृष्ण जिनके लिये मूर्ख राजा और रंक तपस्या करके सर्दी सहकर भी तपस्या करते हैंयही आनंद के भण्डार कृष्ण ब्रज के प्राणों के प्राण हैंजिनके दर्शनों की अभिलाषाएं लाख-लाख बढती हैंजो पृथ्वी पर रहने वालों का अहंकार मिटाने वाले हैंवही कमल नयन कृष्ण आज देखो यशोदा माँ के सामने बची खुची मलाई लेने के लिये मचले खडे हैं

वस्तुत: रसखान के कृष्ण चाहे अलौकिक हों पर वे भक्तों को आनंदित करने के लिये और उनके प्रेम को स्वीकार करने के लिये तथा लोक की रक्षा के लिये साकार रूप ग्रहण किये हैं

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